वृद्धि और विकास की परिभाषा, वृद्धि और विकास में अंतर

वृद्धि और विकास दोनों शब्द प्रायः एक ही अर्थ में प्रयोग किए जाते हैं, किंतु मनोवैज्ञानिकों के अनुसार वृद्धि और विकास में कुछ अंतर होता है। विकास का संबंध अभिवृद्धि से अवश्य होता है पर यह शरीर के अंगों में होने वाले परिवर्तनों को विशेष रूप से व्यक्त करता है। उदाहरणार्थ, बालक की हड्डियां आकार में बढ़ती है, यह बालक की अभिवृद्धि है, किंतु हड्डियां कड़ी हो जाने के कारण उनके स्वरूप में जो परिवर्तन आ जाता है यह विकास को दर्शाता है।

इस प्रकार विकास में अभिवृद्धि का भाव नहीं रहता है। प्रायः यह भी देखने को मिलता है कि बालक की शारीरिक वृद्धि के अनुपात में उसकी कार्यकुशलता में प्रगति नहीं होती है। ऐसी स्थिति में यह कहा जाता है कि बालक की वृद्धि तो हो गई है किंतु उसका विकास नहीं हुआ है।

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वृद्धि और विकास में अंतर

वृद्धि और विकास का प्रयोग लोग प्रायः पर्यायवाची शब्दों के रूप में करते हैं। अवधारणात्मक रूप से देखा जाए तो वृद्धि और विकास दोनों में अंतर होता है।

वृद्धि

वृद्धि शब्द का प्रयोग परिणात्मक परिवर्तनों; जैसे बच्चे के बड़े होने के साथ उसके आकार, ऊंचाई, लंबाई इत्यादि के लिए होता है। वृद्धि विकास की प्रक्रिया का एक चरण होता है। वृद्धि का क्षेत्र सीमित होता है। वृद्धि की क्रिया आजीवन नहीं चलती। बालक के परिपक्व होने के साथ ही यह रुक जाती है। इसे मापा जा सकता है। वृद्धि  दिशाहीन होती है।

विकास

विकास शब्द का प्रयोग परिमाणात्मक परिवर्तनों के साथ साथ व्यवहारिक परिवर्तनों; जैसे कार्यकुशलता, कार्यक्षमता, व्यवहार में सुधार इत्यादि के लिए भी होता है । विकास अपने-आप में एक विस्तृत अर्थ रखता है। वृद्धि इसका एक भाग होती है। विकास एक सतत प्रक्रिया है। बालक के परिपक्व होने के बाद भी यह चलती रहती है। इसे मापा नहीं जा सकता। इसकी निश्चित दिशा होती है।

वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले कारक

वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले अनेक तत्व होते हैं। इन तत्वों द्वारा वृद्धि और विकास को गति प्राप्त होती है तथा यह तत्व वृद्धि और विकास को नियंत्रित भी रखते हैं। वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं

1. वंशानुक्रम

बालक का वृद्धि और विकास वंशानुक्रम (Heredity) में उपलब्ध गुण एवं क्षमताओं पर निर्भर रहता है। गर्भधारण करने के साथ ही बालक में पैत्रक कोशो का विकास आरंभ हो जाता है तथा यहीं से बालक की वृद्धि और विकास की सीमाएं सुनिश्चित हो जाती हैं यह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं । बालक के कद, आकृति, बुद्धि, चरित्र आदि को भी वंशानुक्रम संबंधी विशेषताएं प्रभावित करती हैं।

2.वातावरण

वातावरण भी बालक के वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाला मुख्य तत्व है। वातावरण के प्रभाव स्वरूप व्यक्ति में अनेक विशेषताओं का विकास होता है। शैशवावस्था से ही वातावरण बालक को प्रभावित करने लगता है। बालक के जीवन दर्शन एवं शैली का स्वरूप स्कूल समाज पड़ोस तथा परिवार के प्रभाव के परिणाम स्वरूप ही स्पष्ट होता है।

3.बुद्धि

मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के आधार पर निश्चित किया है कि कुशाग्र बुद्धि वाले बालकों का शारीरिक एवं मानसिक विकास मंदबुद्धि वालों की अपेक्षा अधिक तेज गति से होता है कुशाग्र बुद्धि बालक शीघ्र बोलने एवं चलने लगते हैं

4.लिंग

बालकों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में लिंग भेद का प्रभाव भी पड़ता है। जन्म के समय बालकों का आकार बड़ा होता है किंतु बाद में बालिकाओं में शारीरिक विकास की गति तीव्र होती है। इसी प्रकार बालिकाओं में मानसिक एवं यौन परिपक्वता बालकों से पहले आ जाती है ।

5.पोषण

यह वृद्धि और विकास का महत्वपूर्ण घटक होता है। बालकों के विकास के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। यदि हमारे खानपान में उपयुक्त पोषक तत्वों की कमी होगी तो वृद्धि एवं विकास से प्रभावित होगा।

6.वायु एवं प्रकाश

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ वायु की आवश्यकता होती है, अगर वायु स्वच्छ ना मिले तो बालक बीमार हो सकता है एवं इसके अभाव में कार्य करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है । शारीरिक विकास के लिए सूर्य के प्रकाश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि सूर्य के प्रकाश में विटामिन डी की प्राप्ति होती है जो विकास के लिए है आवश्यक है।

वृद्धि और विकास की अवस्थाएं

प्रत्येक बच्चे के वृद्धि और विकास की विभिन्न अवस्थाएं होती हैं। इन्हीं अवस्थाओं में बच्चों का एक निश्चित विकास होता है। विकास की इस सीमा को ध्यान में रखते हुए वृद्धि और विकास को निम्न के चरणों में विभाजित करने का प्रयास किया गया है।

  • शैशवावस्था- जन्म से 2 वर्ष तक
  • प्रारंभिक अवस्था बाल्यावस्था- 3 से 6 वर्ष तक
  • मध्य बाल्यावस्था- 6 से 9 वर्ष तक
  • उत्तर बाल्यावस्था- 9 से 12 वर्ष
  • पूर्व किशोरावस्था प्रारंभिक- 11 से 15 वर्ष तक
  • किशोरावस्था- बाद की अवस्था 15 से 18 वर्ष तक
  • वयस्क 18 वर्ष के बाद

वृद्धि और विकास की अवस्थाओं की प्रमुख विशेषताएं

मानव विकास का वृद्धि और विकास, विकास की विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरता है। वृद्धि और विकास की प्रत्येक अवस्था विकासात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है।

1- गर्भावस्था

प्रायः गर्भावस्था 9 माह या लगभग 280 दिनों तक रहती है । इस अवस्था को गर्भाधान से शिशु जन्म तक की अवधि को माना जाता है । गर्भावस्था में वृद्धि और विकास की गति तीव्र होती है। शरीर के सभी अंगों की आकृतियों का निर्माण इस काल में हो जाता है । गर्भावस्था का वृद्धि और विकास मा के खानपान से अधिक प्रभावित होता है। अध्ययन की दृष्टि से संपूर्ण गर्भावस्था को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं

A.डिंबावस्था

यह अवस्था गर्भाधान से 2 सप्ताह तक रहती है। इसका आकार अंडे के समान होता है और यह इधर-उधर नलिका में तैरता रहता है, जो मां के गर्भाशय तक जाती है। गर्भनाल के द्वारा मां के रुधिर प्रवाह से डिंब अपना आहार प्राप्त करता है ।

B.पिंड अवस्था

यह अवस्था तीसरे सप्ताह से दूसरे महीने के अंत तक रहती है । इस अवस्था में गर्व पिंड मानव आकृति धारण कर लेता है । इसमें विकास गति तीव्र होती है । 6 सप्ताह का गर्भपिंड होने पर, उसमें हृदय की धड़कन प्रारंभ हो जाती है ।

C.भ्रूण अवस्था

यह अवस्था 3 माह से 9 माह तक रहती है । इस अवस्था में किसी नवीन अंग का विकास नहीं होता, बल्कि पिंडा वस्था में निर्मित अंगों का विकास होता है इस अवस्था में मानव शिशु की आकृति का पूर्ण विकास होता है ।

2.शैशवावस्था

इस अवस्था को बालक का निर्माण काल माना जाता है । यह अवस्था जन्म से दूसरे वर्ष तक मानी जाती है । इस अवस्था में बालक अपरिपक्व होता है तथा दूसरों पर पूर्णता निर्भर रहता है शैशवावस्था की प्रमुख विशेषताएं निम्न है,

  • शारीरिक विकास की तीव्रता
  • मानसिक क्रियाओं की तीव्रता
  • सीखने की प्रक्रिया की तीव्रता
  • दूसरों पर निर्भरता
  • आत्म प्रेम की भावना
  • सामाजिक भावनाओं का तीव्र विकास
  • अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति
  • संवेग ओं का प्रदर्शन

3.बाल्यावस्था

यह अवस्था 3 माह से 12 वर्ष की अवधि तक मानी जाती है । इस अवस्था में बालक के अनेकों परिवर्तन होते हैं, इसलिए विकास की दृष्टि से यह अवस्था को एक जटिल अवस्था माना जाता है । बालक में नैतिकता भी विकसित हो जाती है जिससे वह उचित अनुचित का निर्णय कर सकता है । बाल्यावस्था में अपने समूह के प्रति बड़ी ही आस्था होती है उसमें आपस में सहयोग प्रेम सहानुभूति का भाव विकसित होता है ।बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएं निम्न है

  • मानसिक योग्यता में वृद्धि
  • जिज्ञासा की प्रबलता
  • वास्तविक जगत से संबंध
  • सामाजिक गुणों का विकास नैतिक गुणों का विकास
  • बहिर्मुखी व्यक्तित्व का विकास
  • सामूहिक खेलों में रुचि
  • शारीरिक एवं मानसिक स्थिरता

4.किशोरावस्था

यह अवस्था जीवन का संधि काल है । किशोरों तथा किशोरियों में काम भावना के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं । किशोर तथा किशोरियों अपने को अच्छा दिखाने के लिए सजते सवरते हैं जिससे विपरीत लिंग का आकर्षण उनके प्रति बड़े । यह अवस्था तूफान, तनाव तथा स्वप्न की अवस्था कही जाती है, जिसमें विरोधी प्रवृत्तियों का विकास होता है । किशोरावस्था की अवधि कल्पनात्मक तथा भावात्मक होती है । यहीं पर जीवन साथी की तलाश होती है । अनुशासन तथा सामाजिक नियंत्रण का भाव विकसित हो जाता है । कुल मिलाकर इस अवस्था का सबसे बड़ा ऋण आत्मक पहलू यह है कि इसमें समायोजन की क्षमता कम पाई जाती है । किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताएं निम्न है

  • शारीरिक परिवर्तन
  • अत्यंत जटिल अवस्था
  • घनिष्ट व व्यक्तित्व मित्रता
  • समायोजन का अभाव
  • स्वतंत्रता व विद्रोह की भावना काम शक्ति की परिपक्वता
  • रुचियां में परिवर्तन एवं स्थिरता ईश्वर धर्म में विश्वास
  • 12 से 18 वर्ष के बीच की अवस्था
  • नशा या अपराध की ओर उन्मुख होने की संभावना

5.प्रौढ़ावस्था

यह अवस्था व्यवहारिक जीवन की अवस्था कहीं जाती है इसमें पारिवारिक जीवन या गृहस्थ जीवन की गतिविधियां होती हैं । जिसमें कल्पना ही नहीं रह जाती वरन वास्तविक जीवन की अंतर क्रियाएं होती हैं । इस अवस्था में उसे अनेकों प्रकार के संघर्ष तथा समस्याओं का सामना करना पड़ता है । उसे तरह-तरह के उत्तरदायित्व का निर्वाह भी करना पड़ता है । यह अवस्था सामाजिक तथा व्यवसाय क्षेत्र के विकास की उत्कृष्ट अवस्था होती है सबसे अधिक विकास इसी अवस्था में होता है ।

6.वृद्धावस्था

यह अवस्था बाल्यावस्था की तरह अत्यधिक संवेदनशील मानी जाती है । उत्तरदायित्व समाप्त करने के बाद व्यक्ति इस अवस्था में आध्यात्मिक चिंतन की ओर बढ़ता है । शारीरिक क्षमता कम होने लगती हैं । स्मरण शक्ति का कमजोर होना निर्णय की क्षमता में कमी जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं । वृद्धावस्था में समायोजन का भी अभाव पाया जाता है क्योंकि नई पीढ़ी के साथ उसके मूल्यों का टकराव भी होता है । कभी-कभी अपने को असहाय एवं उपेक्षित भी अनुभव करते हैं वृद्धावस्था में तरह तरह के शारीरिक मानसिक परिवर्तन होते हैं बीमारियां भी इस अवस्था में अधिक होती हैं तनाव उच्च रक्तचाप ज्ञानेंद्रियों तथा कर्मेंद्रियों की क्षमता तथा शक्ति की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं ।

विकास की अवधारणा

विकास जीवनपर्यन्त चलने वाली एक प्रक्रिया है । विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक (Physical), क्रियात्मक (Motor), संज्ञानात्मक (Cognitive), भाषागत (Language), संवेगात्मक (Emotional), एवं सामाजिक (Social) विकास होता है । बालक में आयु के साथ होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन सामान्यतया देखे जाते हैं ।

विकास के अभिलक्षण

विकास एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जो गर्भधारण से लेकर मृत्युपर्यन्त होती रहती है । विकासात्मक परिवर्तन प्राय; व्यवस्थित प्रगतिशील और नियमित होते हैं । विकास बहु-आयामी होता है, अर्थात् कुछ क्षेत्रों में यह बहुत तीव्र वृद्धि को दर्षाता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में धीमी गति से होता है ।

विकास बहुत ही लचीला होता है इसका तात्पर्य है कि एक ही व्यक्ति अपनी पिछली विकास दर की तुलना में किसी विशिष्ट क्षेत्र में अपेक्षाकृत आकस्मिक रूप से अच्छा सुधार प्रदर्षित कर सकता है । एक अच्छा परिवेष शारीरिक शक्ति अथवा स्मृति और बुद्वि के स्तर में अनापेक्षित सुधार ला सकता है । विकासात्मक परिवर्तन ’मात्रात्मक’ एवं गुणात्मक दोनों हो सकते है, जैसे- आयु बढ़ने के साथ कद बढ़ना अथवा ’गुणात्मक’ जैसे नैतिक मूल्यों का निर्माण ।

मनोवैज्ञानिकों ने अध्धयन की सुविधा के दृष्टिकोण से विकास को निम्नलिखित भागो में बाटॉ हैं

1.शारीरिक विकास

शरीर के बाह्य परिवर्तन, जैसे-उॅचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि जिन्हें स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, किन्तु शरीर के आन्तरिक अवयवों के परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई तो नहीं पड़ते, किन्तु शरीर के भीतर इनका समुचित विकास होता है । प्रारम्भ में शिशु अपने हर प्रकार के कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, धीरे-धीरे विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप वह अपनी आवष्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होता जाता है

2.मानसिक विकास

संज्ञानात्मक या मानसिक विकास से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है,जिनके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है । कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, अवलोकन, बुद्धितर्क, समस्या-समाधान करना, निर्णय लेना इत्यादि की योग्यता मानसिक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं । जन्म के समय बालक में इस प्रकार की योग्यता का अभाव होता है, धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है।

3.सांवेगिक विकास

संवेग, जिसे भाव भी कहा जाता है इसका अर्थ होता है, ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है जैसे-भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, खुशी इत्यादि संवेग के उदाहरण हैं । बालक में आयु बढ़ने के साथ ही इन संवेगों के विकास भी होते रहते हैं । बालक का संवेगात्मक व्यवहार उसकी शारीरिक वृद्धि एवं विकास को ही नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है ।

जन्म से ही शिशु का संवेगात्मक व्यवहार आरम्भ हो जाता है। छह माह की आयु में शिशु में भय एवं क्रोध, एक वर्ष की आयु में प्रेम एवं उल्लास, डेढ़ वर्ष की आयु ईर्ष्या, दो वर्ष की आयु में प्रसन्नता आनन्द क्रोध घृणा,इत्यादि संवेगों का विकास होने लगता है तीन वर्ष की अवस्था में बालकों में सभी संवेगों का विकास हो जाता है ।

4.क्रियात्मक विकास

क्रियात्मक विकास का अर्थ होता है व्यक्ति की कार्य करने की शक्तियों, क्षमताओं या योग्यताओं का विकास करना । क्रियात्मक शक्तियों, क्षमताओं या योग्यताओं का अर्थ होता है ऐसी शारीरिक गतिविधियां या क्रियाएं, जिनको सम्पन्न करने के लिए मॉंसपेषियों एवं तन्त्रिकाओं की गतिविधियों के संयोजन की आवष्यकता होती है; जैसे चलना, बैठना इत्यादि ।

5.भाषायी विकास

भाषा के विकास को एक प्रकार से संज्ञानात्मक, भावनात्मक विकास माना जाता है । भाषा के माध्यम से बालक अपने मन के भावों, विचारों को एक-दूसरे के सामने रखता है एवं दूसरे के भावों, विचारों एवं भावनाओं को समझता है ।

6.सामाजिक विकास

सामाजिक विकास का शाब्दिक अर्थ होता है समाज के अन्तर्गत रहकर विभिन्न पहलुओं को सीखना अर्थात् समूह के स्तर पर परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों के अनुकूल स्वयं को ढालना, एकता, मेल-जोल तथा पारम्परिक सहयोग की भावना को आत्मसात करना । समाज के अन्तर्गत ही चरित्र निर्माण तथा जीवन से सम्बन्धित व्यावहारिक गुणों इत्यादि का विकास होता है । बालकों के विकास की प्रथम पाठशाला परिवार को माना गया है, तत्पष्चात् समाज को एक दूसरे के सम्पर्क में आने से समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

वृद्धि और विकास in Hindi

वृद्धि और विकास हिंदी में

growth and development in hindi

वृद्धि और विकास FAQ

बाल अवस्था कितने प्रकार के होते हैं

प्रत्येक बच्चे के विकास के 4 प्रकार होते हैं ।
1-शैशवावस्था- जन्म से 2 वर्ष तक
2-बाल्यावस्था- 3 से 12 वर्ष तक
3-किशोरावस्था – 12 से 18 वर्ष तक
4.प्रौढ़ावस्था- 18 वर्ष के बाद

2 से 6 वर्ष की अवस्था को क्या कहा जाता है

2 से 6 वर्ष की अवस्था को प्रारंभिक अवस्था बाल्यावस्था कहा जाता है

12 से 18 वर्ष की अवस्था को क्या कहते हैं

12 से 18 वर्ष की अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है। यह अवस्था जीवन का संधि काल है । यह अवस्था तूफान, तनाव तथा स्वप्न की अवस्था कही जाती है, जिसमें विरोधी प्रवृत्तियों का विकास होता है । किशोरावस्था की अवधि कल्पनात्मक तथा भावात्मक होती है । यहीं पर जीवन साथी की तलाश होती है । अनुशासन तथा सामाजिक नियंत्रण का भाव विकसित हो जाता है । कुल मिलाकर इस अवस्था का सबसे बड़ा ऋण आत्मक पहलू यह है कि इसमें समायोजन की क्षमता कम पाई जाती है ।

बाल्यावस्था के दो भाग कौन कौन से हैं

बाल्यावस्था को दो भागों में विभाजित किया गया है, प्रारंभिक अवस्था बाल्यावस्था- 3 से 6 वर्ष तक एवं उत्तर बाल्यावस्था-9 से 12 वर्ष के रूप में विभाजित किया गया हैं ।

शैशवावस्था की आयु कितनी होती है

शैशवावस्था की आयु शैशवावस्था जन्म से 2 वर्ष तक होती हैं । इस अवस्था को बालक का निर्माण काल माना जाता है । यह अवस्था जन्म से दूसरे वर्ष तक मानी जाती है । इस अवस्था में बालक अपरिपक्व होता है तथा दूसरों पर पूर्णता निर्भर रहता है

विकास के कितने आयाम हैं

विकास के प्राथमिक 6 आयाम हैं
1. शारीरिक विकास
2.मानसिक विकास
3.सांवेगिक विकास
4.क्रियात्मक विकास
5. भाषायी विकास
6.सामाजिक विकास

बालक का सामाजिक विकास क्या हैं

सामाजिक विकास का शाब्दिक अर्थ होता है समाज के अन्तर्गत रहकर विभिन्न पहलुओं को सीखना अर्थात् समूह के स्तर पर परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों के अनुकूल स्वयं को ढालना, एकता, मेल-जोल तथा पारम्परिक सहयोग की भावना को आत्मसात करना । समाज के अन्तर्गत ही चरित्र निर्माण तथा जीवन से सम्बन्धित व्यावहारिक गुणों इत्यादि का विकास होता है । बालकों के विकास की प्रथम पाठशाला परिवार को माना गया है, तत्पष्चात् समाज को एक दूसरे के सम्पर्क में आने से समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ।

बालक का भावनात्मक विकास क्या है

भावनात्मक विकास- संवेग, जिसे भाव भी कहा जाता है इसका अर्थ होता है, ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है जैसे-भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, खुशी इत्यादि संवेग के उदाहरण हैं । बालक में आयु बढ़ने के साथ ही इन संवेगों के विकास भी होते रहते हैं । बालक का संवेगात्मक व्यवहार उसकी शारीरिक वृद्धि एवं विकास को ही नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है ।

संज्ञानात्मक विकास क्या हैं

संज्ञानात्मक या मानसिक विकास से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है,जिनके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है । कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, अवलोकन, बुद्धितर्क, समस्या-समाधान करना, निर्णय लेना इत्यादि की योग्यता मानसिक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं । जन्म के समय बालक में इस प्रकार की योग्यता का अभाव होता है, धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है।

वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले कारक कौन कौन से हैं

वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले कारक
1.वंशानुक्रम
2.वातावरण
3.बुद्धि
4.लिंग
5.पोषण
6.वायु एवं प्रकाश

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