बुद्धि, हॉवर्ड गार्डनर का बुद्धि सिद्धान्त, बुद्धि परीक्षण

बुद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यतः प्रज्ञा, प्रतिभा, ज्ञान एवं समझ इत्यादि के अर्थों में किया जाता है। यह वह शक्ति है, जो हमें समस्याओं का समाधान करने एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। बुद्धि के सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिकों में मतभेद हैं, फिर भी यह निश्चित तोर पर कहा जाता है कि यह किसी के व्यक्तित्व का मुख्य निर्धारक है, क्योंकि इससे व्यक्ति की योग्यता का पता चलता है।

इसे व्यक्ति की जन्मजात शक्ति कहा जाता है, जिसके उचित विकास में उसके परिवेश की भूमिका प्रमुख होती है। मानव विकास की विभिन्न अवस्थाओं में बुद्धि के विकास में भी अन्तर होता है। बुद्धि एक ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की क्षमता प्रदान करती है।

बुद्धि कोई मूर्त वस्तु नहीं है जिसे देखा जा सके। यह अमूर्त है इसलिये केवल इसके प्रभावों और परिणामों को ही जाना जा सकता है। बुद्धि के आधार पर ही व्यक्ति की योग्यताओं का निर्धारण होता है जो अपनी बौद्धिक क्षमताओं का प्रयोग कर अपनी समस्याओं का निदान आसानी से कर लेते हैं वे योग्य और कुशल कहलाते है।

बुद्धि के मुख्य तीन पक्ष होते हैं- कार्यात्मक, संरचनात्मक एवं क्रियात्मक।

बुद्धि के प्रकार

बुद्धि का विभाजन करना एक कठिन कार्य है। बुद्धि तो वह क्षमता है जिसका उपयोग व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों तथा परिवेश में करता है। इस आधार पर बुद्धि का वर्गीकरण विद्वानों ने इस प्रकार किया है

1.समाजिक बुद्धि

सामाजिक बुद्धि से तात्पर्य वैसी सामान्य मानसिक क्षमता से होता है जिसके सहारे व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को अच्छी तरह से समझता है। ऐसे लोगों का सामाजिक सम्बन्ध काफी अच्छा होता है तथा समाज में इनकी प्रतिष्ठा उच्च स्तर की होती है। इनमें सामाजिक कौशलता बहुत होती है।

जिन व्यक्तियों में सामाजिक बुद्धि होती है, उनमें अन्य लोगों के साथ प्रभावपूर्ण ढंग से व्यवहार करने की क्षमता, अच्छा आचरण करने की क्षमता एवं समाज के अन्य लोगों से मिल-जुलकर सामाजिक कार्यों में हाथ बॉटनें की क्षमता अधिक होती है। ऐसी बुद्धि व्यक्ति को जीवन में व्यावहारिक सफलता दिलाने में काफी सहायक होती है। स्पष्ट है कि सामाजिक बुद्धि एक ऐसी बुद्धि है, जो व्यक्ति को सामाजिक परिस्थितियों में समायोजित होने में मदद करती है।

2.अमूर्त बुद्धि

अमूर्त विषयों के बारे में चिन्तन करने की क्षमता को ही अमूर्त बुद्धि कहा जाता है। ऐसी बुद्धि में व्यक्ति शब्द, प्रतीक तथा अन्य अमूर्त चीजों के सहारे अच्छा चिन्तन कर लेता है। इस ढंग की क्षमता दार्शनिकों, कलाकारों, कहानीकारों आदि में अधिक होती है। ऐसे लोग प्रायः अपने विचारों, कल्पनाओं एवं मानसिक प्रतिभाओं के सहारे बडी-बडी समस्याओं का समाधान कर लेते है। जिन छात्रों में अमूर्त बुद्धि अधिक होती है, उनकी शैक्षिक उपलब्धियॉ अधिक श्रेष्ठ होती है। वे सफल कलाकार, पेंटर, गणितज्ञ एवं कहानीकार आदि बनते है।

टरमैन के अनुसार अमूर्त बुद्धि का महत्व छात्रों की अन्य दूसरी तरह की बुद्धि से अधिक होता है, इस प्रकार की बुद्धि को कुछ लोगों ने सैद्धान्तिक बुद्धि भी कहा है।

3.मूर्त बुद्धि

मूर्त बुद्धि से तात्पर्य वैसी मानसिक क्षमता से होता है जिसके सहारे व्यक्ति मूर्त या ठोस वस्तुओं के महत्व को समझता है, उनके बारे में सोचता है तथा अपनी इच्छा एवं आवश्यकतानुसार उनमें परिवर्तन लाकर उन्हें उपयोगी बनाता है। इसे व्यावहारिक बुद्धि भी कहा जाता है। जिन बालकों में मूर्त बुद्धि अधिक होती है उनमें हस्तकलाओं की क्षमता अधिक होती है तथा वे आगे चलकर एक सफल इंजीनियर या कुशल कारीगर बनने में सफलता प्राप्त करते है।

बुद्धि की विशेषताएँ

बुद्धि एक सामान्य योग्यता है । इस योग्यता के द्वारा व्यक्ति स्वयं को तथा दूसरे को समझता है। सच यह है कि सामाजिक तथा वैयक्तिक परिवेश में अन्तःक्रियात्मक गतिशीलता तथा क्षमता का नाम बुद्धि है। बुद्धि की विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  • बुद्धि, व्यक्ति की जन्मजात शक्ति है।
  • बुद्धि, व्यक्ति को अमूर्त चिन्तन की योग्यता प्रदान करती है।
  • बुद्धि, व्यक्ति को विभिन्न बातों को सीखनें मे सहायता देती है।
  • बुद्धि, व्यक्ति को अपने पूर्व अनुभवों से लाभ उठाने की क्षमता देती है। बुद्धि, व्यक्ति की कठिन परिस्थितियों और जटिल समस्याओं को सरल बनाती है।
  • बुद्धि, व्यक्ति को भले और बुरे, सत्य और असत्य, नैतिक और अनैतिक कार्यों में अन्तर करने की योग्यता देती है। बुद्धि, पर वंशानुक्रम और वातावरण का प्रभाव पड़ता है।

बुद्धि निर्माण के सिद्धान्त

1.एक कारक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन बिने महोदय ने किया था। उन्होंने इसका प्रचलन सन् 1911 में किया। बाद में इस सिद्धान्त का समर्थन टरमन, स्टर्न तथा एबिंग्हास ने किया। इस सिद्धान्त के अनुसार, बुद्धि केवल एक खण्डात्मक होती है जिसकी मात्रा मनुष्यों में भिन्न-भिन्न होती है। इसे सामान्य बुद्धि का नाम दिया जाता है। बुद्धि सर्वव्यापी मानसिक शक्ति है। सभी मानसिक क्रियाओं में इस महान् शक्ति-बुद्धि का एकछत्र राज्य है। इसके अनुसार वह व्यक्ति, जो एक मानसिक कार्य सुचारू रूप से करता है वह अन्य मानसिक कार्य भी उसी प्रकार सुचारू रूप से करेगा।

बुद्धि के एकछत्र राज्य का प्रवृत्ति के कारण ही इसे निरंकुशवादी सिद्धान्त भी कहते है। बुद्धि केवल एक ही तत्व से निर्मित है तथा समस्त क्षेत्रों में एक ही बुद्धि व्याप्त है, यह सिद्धान्त दोषपूर्ण माना जाता है। हम यह नहीं कर सकते कि एक व्यक्ति जो कला में निपुण है, वह विज्ञान में निपुण होगा। इस प्रकार, यह एक तत्व सिद्धान्त अथवा अखण्ड सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं है।

1.द्विकारक-सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन स्पीयरमैन महोदय ने किया था। इसके अनुसार बुद्धि में दो कारक हैं अथवा सभी प्रकार के मानसिक कार्यों में दो प्रकार की मानसिक योग्याताओं की आवश्यकता होती है प्रथम सामान्य मानसिक योग्यता (S कारक), द्वितीय विशिष्ट मानसिक योग्यता (G कारक), सामान्य योग्यता सभी प्रकार के मानसिक कार्यों में पाई जाती है, जबकि विशिष्ट मानसिक योग्यता केवल विशिष्ट कार्यों से ही सम्बन्धित होती है।

प्रत्येक व्यक्ति में सामान्य योग्यता के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट योग्यताएं भी पाई जाती हैं। एक व्यक्ति में एक विशिष्ट योग्यता भी सकती है और एक से अधिक विशिष्ट योग्यताएं भी हो सकती है। एक व्यक्ति जितने ही क्षेत्रों में या विषयों में कुशल होता है, उसमें उतनी ही विशिष्ट योग्यताएं पाई जाती है। यदि एक व्यक्ति में एक से अधिक विशिष्ट योग्यताएं हैं तो इन विशिष्ट योग्यताओं में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं पाया जाता है।

स्पीयरमैन का यह विचार था कि एक व्यक्ति में सामान्य योग्यता की मात्रा जितनी ही अधिक पाई जाती है वह उतना ही अधिक बुद्धिमान होता है। स्पीयरमैन के अनुसार बुद्धि के G कारक के अतिरिक्त कुछ और कारक भी होते हैं, जैसे C कारक जिसका अर्थ विचार प्रक्रिया में गति और निष्क्रियता से मुक्ति है। इसी प्रकार W कारक का अर्थ इच्छा शक्ति, आत्मनियन्त्रण तथा संग्लनता से है। कुछ अध्ययन में देखा गया है कि कुछ कार्य निष्पादन इस प्रकार होते हैं जो  G कारक पर आधारित नहीं होते हैं जबकि स्पीयरमैन के अनुसार G कारक सभी कार्यों में सामान्य होता है।

3.हॉवर्ड गार्डनर का बुद्धि सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का विकास गार्डनर द्वारा किया गया। इस सिद्धान्त में गार्डनर ने यह स्पष्ट किया कि बुद्धि का स्वरूप एकाकी न होकर बहुकारकीय होता है। उनके इस सिद्धान्त का आधार उनके द्वारा न्यूरोमनोविज्ञान तथा मनोमितिक विधियों के क्षेत्र में किये गये शोध है। इस सिद्धान्त में स्पष्टतः उन कसौटियों पर भी बल डाला गया है जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि विशेष क्षमता एक अलग बुद्धि है या नहीं। जैसे, मस्तिष्कीय क्षति होने से व्यक्ति की एक विशेष क्षमता यदि प्रभावित हो जाती है, परन्तु उसका प्रभाव अन्य क्षमताओं पर नहीं पड़ता है तो उस प्रभावित क्षमता को अलग बुद्धि माना जा सकता है।

उसी तरह से कुछ व्यक्तियों में एक खास तरह की क्षमता असाधारण मात्रा में होती है जो अपने आप, इस सिद्धान्त की कसौटी के अनुसार, एक अलग बुद्धि की श्रेणी की योग्यता रखती है। इन सब तरह की कसौटियों का उपयोग करते हुए  हॉवर्ड गार्डनर महोदय ने 1983 ई. में बुद्धि का एक नवीन सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसे गार्डनर का बहु-बुद्धि सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। गार्डनर ने मूलतः सात तरह की बुद्धि का वर्णन किया। 1998 में उन्होने इसमें आठवॉ प्रकार तथा 2000 में उन्होनें नौवॉ प्रकार भी जोड़ा।

इस सिद्धान्त के अन्तर्गत तीन कारकों पर बल दिया गया है, जो निम्न प्रकार हैं

  • बुद्धि का स्वरूप एकाकी न होकर बहुकारकीय होता है तथा प्रत्येक बुद्धि एक-दूसरे से अलग होती है।
  • प्रत्येक ज्ञान/बुद्धि एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती है।
  • बुद्धि के विभिन्न प्रकारों में एक-दूसरों के साथ अन्त; क्रिया करने की प्रवृत्ति पाई जाती है । प्रत्येक व्यक्ति में विलक्षण योग्यता होती है।

गार्डनर ने नौ प्रकार की बुद्धि का वर्णन किया है, जो निम्नलिखित हैं

1.भाषाई बुद्धि

इस प्रकार की बुद्धि से भाषा सम्बन्धी क्षमता का विकास होता है, जैसे-कवि

2.तार्किक गणितीय बुद्धि

बुद्धि का यह अंग तार्किक योग्यता एवं गणितीय कार्यों से सम्बद्ध है, जैस-गणितगीय

3.स्थानिक बुद्धि

इस प्रकार की बुद्धि का उपयोग अन्तरिक्ष यात्रा के दौरान, मानसिक कल्पनाओं को चित्र का स्वरूप देने में किया जाता है, जैसे-मूर्तिकार

4.गतिक बुद्धि

इस प्रकार की बुद्धि का प्रयोग सूक्ष्म एवं परिष्कृत समन्वय के साथ शारिरिक गति से जुड़े कार्यों में होता है- नृत्य, सर्कस, व्यायाम पॉयलट।

5.सागीतिक बुद्धि

इस प्रकार के ज्ञान का उपयोग संगीत के क्षेत्र में होता है, जैसे-वायलिन-वादक

6.अन्तरावैयक्तिक बुद्धि

इस प्रकार की बुद्धि का प्रयोग आत्मबोध, पहचान तथा स्वयं की भावनाओं एवं कौशल क्षमता को जानना है।

7.अन्तःवैयक्तिक बुद्धि

इस प्रकार के ज्ञान का उपयोग सामाजिक व्यवहारों में प्राय: होता है, जैसे-डॉक्टर

8.नैसर्गिक बुद्धि या प्राकृतिक

इस प्रकार के ज्ञान का सम्बन्ध वनस्पति जगत्, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु या प्राणी समूह या प्राकृतिक सौन्दर्य को परखने इत्यादि में होता है।

9.अस्तित्ववादी बुद्धि

इस बुद्धि के अन्तर्गत मनुष्य छिपे हुए रहस्यों के बारे में जानने की कोशिश करता है। जैसे- जीवन क्या है? मृत्यु क्या है? आत्मा एवं परमात्मा का अस्तित्व है कि नहीं इत्यादि

बुद्धि परीक्षण

बुद्धि परीक्षण के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व की विशेषताओं का पता लगाया जाता है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि के प्रामाणिक मापन की विधियों की खोज की। इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम जर्मन मनोवैज्ञानिक वुण्ट का नाम आता है, जिसने वर्ष 1879 में बुद्धि में मापन के लिए मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना की। फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिने एवं उसके साथ सइमन ने बुद्धि के मापन का आधार बच्चों के निर्णय, स्मृति, तर्क एवं आंकिक जैसे मानसिक कार्यों को माना। उन्होंने इन कार्यो से सम्बन्धित अनेक प्रश्न तैयार किए और उन्हें अनेक बच्चों पर आजमाया।

इस परीक्षण के अनुसार, जो बालक अपनी आयु के निर्धारित सभी प्रश्नों के सही उत्तर देता है वह सामान्य बुद्धि का होता है, जो अपनी आयु के ऊपर की आयु के बच्चों के लिए निर्धारित प्रश्नों के उत्तर भी दे देता है, वह उच्च बुद्धि का होता है। जो बालक अपनी आयु के ऊपर की आयु के बच्चों के लिए निर्धारित सभी प्रश्नों के सही उत्तर देता है वह सर्वोच्च बुद्धि का होता है एवं जो अपनी आयु के बच्चों के लिए निर्धारित प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दे पाता वह निम्न बुद्धि का होता है। उपरोक्त मनोवैज्ञानिकों के बाद सर्वप्रथम विलियम स्टर्न ने बुद्धि के मापन के लिए बुद्धि-लब्धि के प्रयोग का सुझाव दिया।

बुद्धि का मापन

बुद्धि की माप बुद्धि परीक्षण द्वारा की जाती है। सबसे पहला बुद्धि परीक्षण बिने तथा साइमन ने मिलकर 1905 में बनाया था। यह बुद्धि परीक्षण आने वाले वर्षो में मनोवैज्ञानिकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। फलस्वरूप इसका कई बार संशोधन भी किया गया। इस परीक्षण का सबसे महत्वपूर्ण संशोधन टरमैन द्वारा 1961 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में किया गया। इस संशोधन में सबसे पहली बार बुद्धिलब्धि के सम्प्रत्यय का बुद्धि मापने के सूचक के रूप् में प्रयोग किया गया। इसके बाद अनेक मनोवैज्ञानिकों, जैसे- वेश्लर, अर्थर, कैटेल, रेवेन, गुडएनफ आदि मनोवैज्ञानिकों ने भी बुद्धि परीक्षण बनाकर बुद्धि मापन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

भारत में भी कई मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि परीक्षण का निर्माण किया है। इनमें डॉ. एस.जलोटा, डॉ. मोहनचन्द्र जोशी, डॉ. एस. मुहसिन आदि प्रमुख है।

मानसिक आयु

किसी व्यक्ति का बौद्धिक विकास अपने समान आयु वर्ग की तुलना में कितना हुआ है, इस मापन की विधि को मानसिक आयु कहते है। उदाहरण यदि काई 6 वर्ष का बालक 15 वर्ष के व्यक्ति के अनुसार दिमाग रखता है या सोचता है तो 15 वर्ष उस बालक की मानसिक आयु होगी।

वास्तविक आयु या कालानुक्रम आयु

यह किसी भी मनुष्य की वास्तविक आयु होती है अर्थात् वह कितने वर्ष हो गया है।

उदाहरण

10 वर्ष का व्यक्ति जो 160 अंक लिया हुआ है, उसकी मानसिक आयु क्या होगी ?

बुद्धि-लब्धि = 160

वास्तविक आयु = 10

बुद्धि-लब्धि = मानसिक आयु X (M.A)X100 ÷ वास्तविक आयु

160=M.A x 100/10

M.A= 160X10/100

=16 वर्ष

टरमन ने सर्वप्रथम बुद्धि-लब्धांक ज्ञात करने की विधि बताई।

इसके अनुसार बुद्धि-लब्धि बच्चे की मानसिक आयु को उसकी वास्तविक आयु से भाग करके, 100 से गुणा करने पर प्राप्त की जाती है। इसके अनुसार बुद्धि-लब्धि का सूत्र है

बुद्धि-लब्धि= मानसिक आयु x100/कालानुक्रमिक आयु

उदाहरणस्वरूप,

यदि किसी बालक की मानसिक आयु 12 वर्ष और वास्तविक आयु 10 वर्ष है, तो उसकी बुद्धि-लब्धि की गणना निम्न प्रकार होगी

बुद्धि-लब्धि (IQ) =मानसिक आयु x 10/ कालानुक्रमिक आयु

=12/10 x100 = 120

मनोवैज्ञानिक वेश्लर द्वारा निर्मित IQ वितरण

बुद्धि-लब्धिवितरण
130 या इससे ऊपरअति श्रेष्ठ बुद्धि अर्थात् प्रतिभाशाली बुद्धि
120-129 श्रेष्ठ
110-119उच्च सामान्य बुद्धि
90-109सामान्य बुद्धि
80-89मन्द बुद्धि
70-79क्षीण बुद्धि
69 से नीचेनिश्चित क्षीण बुद्धि

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